समकालीन कृषि संकट और हिन्दी कविता
Abstract
समकालीन भारतीय समाज में कृषि संकट एक जटिल और बहुआयामी समस्या के रूप में उभरकर सामने आया है, जिसमें आर्थिक अस्थिरता, ऋणग्रस्तता, जलवायु परिवर्तन, बाजार की असमानताएँ तथा नीतिगत विफलताएँ प्रमुख कारक हैं। यह संकट केवल कृषि उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों के सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिक जीवन को भी गहराई से प्रभावित करता है। हिन्दी कविता ने इस संकट को संवेदनात्मक और वैचारिक स्तर पर अभिव्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समकालीन कवियों ने किसानों की पीड़ा, आत्महत्या की प्रवृत्ति, विस्थापन, भूमंडलीकरण के दुष्प्रभाव और ग्रामीण जीवन के विघटन को अपनी रचनाओं में सशक्त रूप से चित्रित किया है। हिन्दी कविता में कृषि संकट का चित्रण यथार्थवादी, प्रतिरोधात्मक और करुणात्मक स्वर में मिलता है, जो न केवल वर्तमान सामाजिक संरचना की विसंगतियों को उजागर करता है, बल्कि परिवर्तन की चेतना भी उत्पन्न करता है। यह कविता एक ओर शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाती है, तो दूसरी ओर मानवीय संवेदनाओं और संघर्षशीलता को भी रेखांकित करती है। इस प्रकार, समकालीन हिन्दी कविता कृषि संकट के बहुआयामी पहलुओं को समझने का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरती है।
कुंजी शब्द- कृषि संकट, हिन्दी कविता, किसान जीवन, भूमंडलीकरण, ऋणग्रस्तता, जलवायु परिवर्तन, सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन
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Copyright (c) 2025 Research Stream (eISSN 3049-2610)

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