जलवायु परिवर्तन की वैश्विक राजनीति और भारतः जलवायु न्याय, विकास और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का अध्ययन

Authors

  • डा0 अरविन्द कुमार शुक्ल

Abstract

जलवायु परिवर्तन इक्कीसवीं सदी की सबसे गंभीर वैश्विक चुनौतियों में से एक है, जिसने केवल पर्यावरणीय संकट के रूप में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक शासन, आर्थिक विकास, ऊर्जा नीति और न्याय के प्रश्नों के रूप में भी व्यापक महत्व प्राप्त किया है। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन की समस्या ने विश्व राजनीति को नए सिरे से परिभाषित किया है, जहाँ विकसित और विकासशील देशों के बीच उत्तरदायित्व, संसाधन-वितरण, तकनीकी हस्तांतरण, जलवायु वित्त तथा उत्सर्जन-नियंत्रण को लेकर निरंतर बहस और संघर्ष देखने को मिलता है। इस संदर्भ में जलवायु परिवर्तन की वैश्विक राजनीति केवल पर्यावरणीय सरोकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शक्ति-संतुलन, वैश्विक असमानता, विकास के अधिकार और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों से भी गहराई से जुड़ी हुई है। भारत, एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था और वैश्विक दक्षिण के प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में, जलवायु परिवर्तन की वैश्विक राजनीति में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक ओर भारत विकास, ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिकीकरण, गरीबी उन्मूलन और सामाजिक न्याय की आवश्यकताओं से जुड़ा हुआ है, वहीं दूसरी ओर वह जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों, जैसे तापमान वृद्धि, अनियमित मानसून, जल-संकट, कृषि संकट, जैव-विविधता ह्रास और प्राकृतिक आपदाओं से भी गंभीर रूप से प्रभावित है। इसलिए भारत की जलवायु नीति एक जटिल संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करती है, जिसमें पर्यावरणीय उत्तरदायित्व, राष्ट्रीय विकास-हित, ऊर्जा संक्रमण और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति सभी एक साथ उपस्थित हैं। प्रस्तुत अध्ययन “जलवायु परिवर्तन की वैश्विक राजनीति और भारत” विषय के अंतर्गत इस बात का विश्लेषण करता है कि जलवायु परिवर्तन किस प्रकार वैश्विक राजनीतिक विमर्श का केंद्रीय प्रश्न बन चुका है और भारत इस विमर्श में किस प्रकार अपनी भूमिका, स्थिति और नीति-दृष्टि का निर्माण कर रहा है। अध्ययन में जलवायु शासन की प्रमुख संधियोंकृजैसे संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (न्छथ्ब्ब्ब्), क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौताकृके संदर्भ में भारत की भूमिका का परीक्षण किया जाएगा। साथ ही जलवायु न्याय, “समान किंतु विभेदित उत्तरदायित्व” जलवायु वित्त, तकनीकी हस्तांतरण, नवीकरणीय ऊर्जा, नेट-ज़ीरो लक्ष्यों तथा सतत विकास के संदर्भ में भारत की नीति और कूटनीतिक दृष्टिकोण का विश्लेषण किया जाएगा। यह शोध मुख्यतः गुणात्मक पद्धति पर आधारित है, जिसमें पुस्तकों, शोध-पत्रों, अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों, नीति-दस्तावेजों, सरकारी प्रकाशनों और बहुपक्षीय समझौतों का विश्लेषण किया जाएगा। अध्ययन का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि जलवायु परिवर्तन की वैश्विक राजनीति में भारत केवल एक प्रभावित देश नहीं, बल्कि एक सक्रिय, उत्तरदायी और संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभर रहा है। निष्कर्षतः यह शोध दर्शाएगा कि भारत की जलवायु नीति विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है तथा वह वैश्विक दक्षिण के हितों, जलवायु न्याय और सतत विकास के पक्ष में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक भूमिका निभा रहा है।
मुख्य शब्द- जलवायु परिवर्तन, वैश्विक राजनीति, भारत, जलवायु न्याय, पर्यावरणीय कूटनीति, पेरिस समझौता, वैश्विक जलवायु शासन, सतत विकास, कार्बन उत्सर्जन, वैश्विक दक्षिण.

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Published

31-03-2026

How to Cite

डा0 अरविन्द कुमार शुक्ल. (2026). जलवायु परिवर्तन की वैश्विक राजनीति और भारतः जलवायु न्याय, विकास और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का अध्ययन. Research Stream (eISSN 3049-2610), 3(01), 1–21. Retrieved from https://journalresearchstream.ijarms.org/index.php/rs/article/view/63

Issue

Section

Research Paper