पर्यावरणीय ह्रास एवं सतत विकास की आवश्यकता के सन्दर्भ में नैतिकता एवं विधिक दायित्व
Abstract
पर्यावरणीय विधि मानव सभ्यता की स्थिरता और सतत विकास की आधारशिला है। औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और वैश्विक तापमान वृद्धि के युग में पर्यावरण संरक्षण वर्तमान में नैतिकता आधारित न होकर विधिक दायित्व आधारित बन गया है। पर्यावरणीय विधियों का मुख्य उद्देश्य मानव जीवन की गुणवत्ता बनाए रखते हुए प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा और न्यायसंगत उपयोग सुनिश्चित करना है। पर्यावरणीय विधियाँ वैश्विक सतत विकास की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कार्यरत हैं, यद्यपि सामाजिक-आर्थिक प्रगति और भावी पीढ़ियों के हित की रक्षा भी सुनिश्चित करती हैं। ‘प्रदूषक भुगतान’, ‘पूर्व-सावधानी’, ‘अंतरपीढ़ी न्याय’, और ‘संसाधनों का सतत उपयोग’, जैसे प्रमुख सिद्धांत नीति निर्माण और न्यायिक दृष्टिकोण को दिशा देते हैं। भारत के सन्दर्भ में, वन संरक्षण अधिनियम 1972, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, जल एवं वायु अधिनियमों के माध्यम से नागरिक-कर्तव्य, राज्य की जिम्मेदारी, और मूल अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। पंचवर्षीय योजनाओं, और मंत्रालयों द्वारा सतत विकास के लिए कई विधिक एवं संवैधानिक उपाय किये गये हैं। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन, वन कटाई, प्लास्टिक प्रदूषण और जैव विविधता ह्रास जैसी चुनौतियाँ वैश्विक संकट का रूप ले चुकी हैं। ऐसे में केवल विधिक प्रावधान पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके प्रभावी प्रवर्तन, हेतु जनजागरूकता और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है। सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति भी तभी सम्भव है जब पर्यावरण संरक्षण को प्रत्येक नीति और योजना में समाहित किया जाये। अतः यह कहा जा सकता है कि पर्यावरणीय विधि केवल नियमों का संकलन नहीं है, बल्कि मानव और प्रकृति के मध्य संतुलन का संवैधानिक और नैतिक माध्यम है। इसका प्रभावी क्रियान्वयन ही वह मार्ग प्रषस्त कर सकता है जो आने वाले समय में एक सुरक्षित, स्वस्थ विश्व का निर्माण कर सके।
मुख्य शब्दः पर्यावरणीय विधि, सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, और जैव विविधता।
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