महाभारत में धर्म का स्वरुप
Abstract
महाभारत में धर्म का स्वरूप अत्यंत जटिल, बहुआयामी और संदर्भपरक रूप में प्रस्तुत हुआ है। धर्म को केवल नैतिकता या कर्तव्य के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के समग्र संतुलन और सामाजिक व्यवस्था के आधार के रूप में देखा गया है। महाभारत के विभिन्न प्रसंगों में धर्म की व्याख्या परिस्थितियों के अनुसार बदलती हुई दिखाई देती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि धर्म स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील और व्यावहारिक है। युधिष्ठिर को धर्मराज के रूप में चित्रित किया गया है, जो सत्य, न्याय और कर्तव्य के पालन के आदर्श हैं, वहीं श्रीकृष्ण धर्म के व्यावहारिक और नीति-प्रधान स्वरूप को प्रस्तुत करते हैं, जहाँ धर्म की रक्षा के लिए कभी-कभी नीति और चातुर्य का सहारा भी लिया जाता है। महाभारत यह दर्शाता है कि धर्म केवल शास्त्रीय नियमों का पालन नहीं, बल्कि समय, स्थान और परिस्थिति के अनुसार उचित निर्णय लेने की क्षमता है। युद्ध, सत्ता, परिवार और व्यक्तिगत संबंधों के बीच धर्म की परीक्षा होती है, जहाँ सही और गलत के बीच स्पष्ट रेखा नहीं होती। इस प्रकार महाभारत में धर्म का स्वरूप सापेक्ष, परिस्थितिनिष्ठ और मानवीय मूल्यों से युक्त है, जो आज भी सामाजिक और नैतिक चिंतन के लिए प्रासंगिक है।
मुख्य शब्द- महाभारत, कर्तव्य, नैतिकता, युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण, धर्म-संकट, सामाजिक न्याय
Additional Files
Published
How to Cite
Issue
Section
License
Copyright (c) 2026 Research Stream (eISSN 3049-2610)

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License.