बाबर और बाबरी मस्जिद की पड़ताल ‘कितने पाकिस्तान‘
Abstract
अपनी उम्र पाँच हजार साल बताने वाले कमलेश्वर ने अपने अन्तिम और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपन्यास ’कितने पाकिस्तान’ के कथानक में भी पाँच हजार वर्षों के इतिहास को समेटा हे। इस उपन्यास की कथा का प्रसार सुदूर अतीत से लेकर कारगिल युद्ध (1999) तक है। इसमें अतीत, इतिहास, परम्परा का इस्तेमाल इस रूप में किया गया है कि वह हमारे वर्तमान के कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्नों और समस्याओं को समझने की एक नई दिशा और सही चिन्तन पद्धति देता है। कमलेश्वर का अदीबे आलिया, अर्दली महमूद अली से कहता है- लेकिन मैं उतने ही अतीत को देखना और समझना चाहता हूँ जो इस वर्तमान पर अपनी काली छाया डालकर हमारी आज की जिन्दगी में नफरत और प्रतिशोध के पाकिस्तानों की नींव डालना चाहता है।’’1 यहाँ कमलेश्वर ने एक इतिहासकार की भूमिका का निर्वहन ठीक ई.एच. कार के तथ्यों के चुनाव वाले सिद्धान्त के अनुसार किया है। ई.एच. कार ने लिखा है। ’’तथ्य अलौकिक पवित्र नहीं हैं क्योंकि हम तथ्यों को अपनी इच्छा के अनुसार चुनते हैं और अपने तरीके से उनका प्रयोग करते हैं। ... इतिहास जॉचे-परखे तथ्यों का एक संग्रह है। ये तथ्य इतिहासकार को दस्तावेजों, शिलालेखों आदि से इस तरह प्राप्त होते हैं जैसे मछली बेचने वाले की तश्तरी में रखी मछलियाँ। इतिहासकार उन्हें इकट्ठा करता है, उन्हें अपने घर ले जाता है और उन्हें उस तरीके से पकाता परोसता है जो उसे अच्छा लगता है.... तथ्य केवल तभी बोलते हैं जब इतिहासकार उन्हें बोलने के लिए कहता है।’’2 इस प्रकार इतिहास लेखन में इतिहासकार की अपनी सोच एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। कमलेश्वर ने भी शाही दरबारी, सरकारी इतिहासकारों के इतिहास (बादशाहनामा, आलमगीरनामा, वकाते आलमगीर, मुन्तखब उल-लुवाब आदि-आदि) से अलग उनके तर्कों की गवाही से अलग ’एक अदीब के दिल की गवाही’ द्वारा जो सच्चा इतिहास लिखा है वह शोषित और दलित देशों की आत्मा पर उत्कीर्ण सच्चाईयों के ज्यादा करीब ले जाता है पाठकों को।
मुख्य शब्दः हिन्दी सहित्य, बाबर, बाबरी मस्जिद की पड़ताल, कितने पाकिस्तान
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