21वीं सदी में भारतीय विदेश नीति पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों की प्रासंगिकता

Authors

  • दीपाली सिंह

Abstract

पण्डित दीनदयाल उपाध्याय (1916.1968) का दर्शन ‘एकात्म मानववाद’ और ‘अंत्योदय’ 21वीं सदी के वैश्वीकृत, पूंजीवादी और तकनीकी-संचालित समाज में नीतिगत और वैचारिक विकल्पों के रूप में अत्यंत प्रासंगिक हैं। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब विश्व पूंजीवाद और समाजवाद/साम्यवाद के वैचारिक द्वंद्व में फंसा हुआ था, तब दीनदयाल जी ने एक ऐसे मार्ग का प्रतिपादन किया जो मानव को केवल एक आर्थिक इकाई न मानकर उसे शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का एकीकृत योग मानता है। प्रस्तुत शोध पत्र 21वीं सदी की समकालीन चुनौतियों जैसे- आर्थिक असमानता, जलवायु परिवर्तन, सतत विकास, मानसिक अवसाद, उपभोक्तावाद और लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के आलोक में उनके विचारों का पुनर्मूल्यांकन करता है। यह शोध पत्र स्पष्ट करता है कि कैसे ‘अंत्योदय’ (समाज के अंतिम व्यक्ति का उदय) की अवधारणा संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों के मूल मंत्र “किसी को पीछे न छोड़े” के साथ पूरी तरह संरेखित है। अंततः,यह शोध प्रदर्शित करता है कि वर्तमान युग के बहुआयामी संकटों का समाधान पश्चिमी भौतिकवादी दृष्टिकोण के बजाय भारतीय एकात्मवादी चिंतन में समाहित है।
मुख्य शब्दः एकात्म मानववाद, अंत्योदय, चिति, विराट, 21वीं सदी, सतत विकास, आर्थिक असमानता।

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Published

31-03-2026

How to Cite

दीपाली सिंह. (2026). 21वीं सदी में भारतीय विदेश नीति पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों की प्रासंगिकता. Research Stream (a Bi-Annual, Open Access, Peer Reviewed International Journal) EISSN 3049-2610, 3(01), 352–357. Retrieved from https://journalresearchstream.ijarms.org/index.php/rs/article/view/121

Issue

Section

Research Paper